Friday, 21 June 2013

चित्र विचित्र

आया था कोरा कागज लेकर ,रंग आए कुछ नए,
क्या थे वो पता नहीं , क्यों थे वो पता नहीं //

पता था मुझे खेलना है आगे ,
 जिंदगी के राह में चलना है आगे //

रंगोकी कश्मकश में मै यु उलज़ गया ,
असली और नखली में अंतर भूल गया //

खुद अपने हातोंसे क्या बनता अपने जीवन का चित्र ,
वोह तो उनके भी है जिनके ना हाथ है ना मित्र  //

क्या लिखू उस चित्र के बारेमें  जो मेरा पहला था ,
कहा खुदाने यह तेरा पहला और आखरी था // 

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